
झंडा किसी और का कहीं ना तन जाए,
मेरी जगह किसी और का ना जलवा छन जाए।
चीनी कराई गई है महंगी इसलिए,
चाय बेचकर कोई प्रधानमंत्री ना बन जाए।
कुर्सी का ऐसा जुगाड़ लगा दिया जाए,
कोई दूसरा इस पर आकर ना तन जाए।
ताले सभी जुबानों पर लगा दिए जाएं,
कोई सच बोलने वाला ना बच जाए।
भाषण में इतने जुमले ठूंस दिए जाएं,
सच भी सुनने में झूठा सा बन जाए।
गरीब को राशन में सपना दिया जाए,
अमीर को पूरा खजाना दिया जाए।
मंच से फकीरी का चोला पहना जाए,
पीछे से सूट लाखों वाला सिया जाए।
धर्म का ऐसा तड़का लगाया जाए,
भूख-प्यास का मुद्दा ही दब जाए।
कैमरे का एंगल ऐसा बनाया जाए,
भीड़ कम भी हो तो ज्यादा दिख जाए।
मीडिया को गोद में बिठा लिया जाए,
सच दिखाने वाला चैनल ही ना बच जाए।
वोट के लिए दंगे करा दिए जाएं,
भाई को भाई से ही लड़ा दिया जाए।
नफरत की ऐसी आंधी चला दी जाए,
इंसानियत का चिराग ही बुझ जाए।
इतना डर चारों तरफ फैला दिया जाए,
कोई परछाई भी सामने ना आ पाए।
बस यही सोचकर नींद उड़ जाए,
कहीं कोई दूसरा सिकंदर ना बन जाए।
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला अमन सनातनी
सावनेर नागपुर महाराष्ट्र












