
ढलने लगी है शाम तुम्हें कुछ ख़बर नहीं
क़िस्से हुए तमाम तुम्हें कुछ ख़बर नही
बिकने लगी बाज़ार में रिश्तों की राखियाँ
घटते है रोज़ दाम तुम्हें कुछ ख़बर नहीं
तहज़ीब, शर्म, प्यार, वफ़ा को भी देखते
चर्चा हुई है आम तुम्हें कुछ ख़बर नहीं।
हरदम हलाल करके ही बस अम्न मुल्क का
टकरा रहे हैं जाम तुम्हें कुछ ख़बर नहीं
जिस्मों की हो दलाली या सौदे हों जिस्म के
दोज़ख़ के हैं हमाम तुम्हें कुछ ख़बर नहीं
हुक्काम दिख रहे हैं हरिक सिम्त बज़्म में
सकते में है अवाम तुम्हें कुछ ख़बर नहीं
मज़हब के नाम पर दिखा जोश-ओ-जुनून ही
होते हैं क़त्ल-ए-आम तुम्हें कुछ ख़बर नहीं
के वी












