
भाग रही है दुनिया आज,
एक अंधी दौड़ में।
छोटी-छोटी उलझनें भी
पहाड़ लगने लगी हैं।
सुख पाने की तलाश में
हमने शांति भी खो दी।
समृद्धि के पीछे भागते-भागते
सहनशीलता की दम तोड़ दी।
पहले आँगन में बैठकर
चाय की चुस्कियों संग
घंटों बातें होती थीं।
अब फ़ोन का नीला निशान
रिश्तों का सबूत बन गया है।
घर एक ही है,
पर दिलों में दीवारें उठ गईं।
जन्मदिन पर स्टेटस लगता है,
गले लग कोई बधाई नहीं देता है।
“व्यस्त हूँ” कह फोन रख देते हैं,
रात भर अकेलेपन से बातें करते हैं।
आज की चकाचौंध…
ये सब धोखा है।
स्क्रीन की चमक में
रिश्तों की गर्माहट ठंडी पड़ गई है।
मिठास थी जो सहजपन में,
वो अब फॉर्मेलिटी बन गई है।
रुको ज़रा…लौट चलो।
गलती हो तो माफी माँग लो,
ईगो की दीवार गिरा दो।
बात करो, सुनो, समझो।
आदित्य धन से घर नहीं बसते,
रिश्ते समय और धीरज से बसते हैं।
वो मिठास फिर लानी होगी,
रिक्तता तो मिटानी होगी।
तभी इस भागती दुनिया में,
इंसान, इंसान रह पाएगा।
डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ












