
विधा : पद्य
गुरु बिन हो ज्ञान नहीं ,
माॅं बिन संस्कार नहीं ।
पिता बिन प्यार कहाॅं ,
प्यार बिन विचार नहीं ।।
विचारहीन आचार कहाॅं ,
आचार बिन प्रचार कहाॅं ।
प्रचार बिन प्रसार कहाॅं ,
प्रसार बिन संसार कहाॅं ।।
सृष्टि बिन यह तन कहाॅं ,
तन बिन होता मन कहाॅं ।
तन मन बिन श्रम नहीं
श्रम बिन होत धन कहाॅं ।।
धन बिन मानव निर्धन ,
निर्धन को अरमान कहाॅं ।
निर्धन जिंदा शव बनता ,
निर्धन को सम्मान कहाॅं ।।
धनी जिंदा धन के सहारे ,
निर्धन का सहारा ईश है ।
निर्धन पल पल संभलता ,
निर्धन हेतु जगदीश है ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।












