
आ गईल लूट के खजाना ,
बाढ़ भईल बढ़िया बहाना ।
चमचा उपनेता दलाल संग ,
ठेकेदार नेता के ह थाना ।।
गरीब के मुॅंह सुखल देखीं ,
बाकी के देखीं हरियराईल ।
मिले के रहे जहाॅं बीस किलो ,
पाॅंच किलो उहवाॅं भेंटाईल ।।
केकरा भागे आईल दहाड़ ,
केकर भागे दहाड़ के बहार ।
केकर बा उपवास उपहास ,
के पूॅंछ हिलावे के तईयार ।।
ढेर जुटी पोंछहिलावन कुत्ता ,
कम पड़िहें निर्धन असहाय ।
मिलजुल खूब मिलबाॅंट होई ,
गरीब के होई बेवाय दिनाय ।।
गरीब त दहाड़ में दह जईहें ,
पोछहिलावन इहाॅं रह जईहें ।
फलना त कहिए मर गईलन ,
जिंदे आदमी के कह जईहें ।।
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।












