
ओम कश्यप
मुसीबतों के साये हैं, मगर हौसला भी बाकी है,
टूटी हुई उम्मीदों में, कोई सिलसिला भी बाकी है।
बहुत थक चुके हैं कदम, मगर रुकना नहीं सीखा,
आँखों में दर्द है लेकिन, एक सपना भी बाकी है।
कभी आँधियाँ आईं, कभी रास्ते खो गए,
मगर दिल ने कहा—चल, अभी रास्ता भी बाकी है।
वो रोज़ सोचती है, कुछ अपना बना लेगी,
हाथों में हुनर है और एक हौसला भी बाकी है।
घर की परेशानी ने जिसे रातों में जगाया,
उसकी आँखों में फिर भी, एक सवेरा भी बाकी है।
किस्मत ने चाहे जितने इम्तिहान ले लिए,
रब की रहमतों का अभी दरवाज़ा भी बाकी है।
जो आज दर्द बनकर सीने में उतर रहा है,
कल वही दर्द शायद, एक दास्ताँ भी बाकी है।
बस एक करम कर दे ऐ मालिक, इस घर पर,
इनकी मेहनत का कोई अच्छा सिला भी बाकी है।
छोटा सा सही, अपना कोई कारोबार हो जाए,
इस ख्वाब की दुनिया में एक आशियाँ भी बाकी है।
जो अपने लिए नहीं, अपनों के लिए जीती है,
उसकी दुआओं में शायद, कोई असर भी बाकी है।
मुसीबतें कहती रहें—हम तुम्हें तोड़ देंगे,
वो मुस्कुराकर कहती है—अभी जज़्बा भी बाकी है।
एक दिन यही अँधेरे रोशनी में बदलेंगे,
यकीन रख, ऐ दिल—अभी ख़ुदा भी बाकी है।












