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ग़ज़ल

डर भुलाता ही गया।
पास आता ही गया।

इश्क़ में दरियादिली,
मैं दिखाता ही गया।

हौसला जितना मिला,
आज़माता ही गया ।

जब तलक़ टूटा भरम,
मैं निभाता ही गया।

बोल जो दिल से उठे,
गुनगुनाता ही गया।

मुझसे जो रूठे अगर,
मैं मनाता ही गया।
नवीन माथुर पंचोली
अमझेरा धार मप्र

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