Uncategorized
Trending

राष्ट्रकवि दिनकर — कलम जिनकी सदा जय बोले

गीत

मुखड़ा
कलम जिनकी सदा जय बोले,
शब्दों में अंगार जले।
राष्ट्रधर्म की राह दिखाकर,
सोए मन में दीप जले।

माटी की पीड़ा को स्वर दे,
जन-मन का विश्वास बने।
अन्यायों के घने कुहासे,
भेद-भंजन प्रकाश बने।
वीर-भाव की गूँज जगाकर,
हर हृदय में साहस घोले।
कलम जिनकी सदा जय बोले,
शब्दों में अंगार जले।

‘रश्मिरथी’ में कर्ण पुकारे,
मानवता का मान रखो।
‘कुरुक्षेत्र’ से युग को समझाया,
द्वेष नहीं, संवाद रखो।
‘हुंकार’ बनी रणभेरी-सी,
बंधन के सब द्वार खोले।
कलम जिनकी सदा जय बोले,
शब्दों में अंगार जले।

साहित्य-सुधा में ओज मिलाया,
जन-जन की आवाज बने।
शब्द तुम्हारे दीपशिखा-से,
तम में पथ के राज बने।
राष्ट्रप्रेम की अमर धरोहर,
पीढ़ी-पीढ़ी मन में डोले।
कलम जिनकी सदा जय बोले,
शब्दों में अंगार जले।

दिनकर! तुम्हारी तेज-किरण से,
हिंदी का आकाश खिला।
वाणी में था सूर्य-ताप भी,
करुणा का मधुमास मिला।
युग बीते, पर अमर तुम्हारी,
लेखनी का सूरज बोले।
कलम जिनकी सदा जय बोले,
शब्दों में अंगार जले।


डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *