
हिन्दी हमारी मातृभाषा,
क्यों नहीं है राष्ट्रभाषा।
यत्र-तत्र,सर्वत्र देखो,
सुख-दुःख में संकट में।
हिंदी हमारा साथ देती,
सहजता में विकट में।
हाव-भाव,प्रभाव एवं,
मन,वचन व कर्म में।
अर्थ -वेद,पुराण के,
धर्म में, सत्कर्म में।
है हिमालय सी अटल,
निर्मल गंग तरंग हिन्दी।
सूर्य-चन्द्र प्रकाश जैसे,
शाश्वत कथा प्रसंग हिंदी।
विश्व हित की बात करती,
मानवता भंडार हिन्दी।
जग गुरु की शक्ति इसमें,
विश्व शांति प्रचार हिंदी।
महादेवी व सुभद्रा,
सूर, तुलसी गान करते।
गुप्त तथा प्रसाद जैसे,
महाकाव्य महान करते।
किंतु कैसी है विवशता,
राष्ट्र भाषा हीन अपना।
देश भारत बना आरत,
स्वयं भाषा बना सपना।
विश्व में हैं देश जितने,
है सभी की राष्ट्रभाषा।
किंतु अपने देश ही का,
क्यों नहीं है राष्ट्र भाषा।
बलराम प्रसाद द्विवेदी
सुंदरी (सुन्दर दादर)
उमरिया -मध्यप्रदेश












