
सत्य झुकता नहीं,
ये वेदों ने कहा हैं।
पर आजकल देखो उसे,
झूठ ने चंहुओर से घेरा हैं।।
सच्चा आदमी अदालतों में रो रहा है,
झूठा मुस्कुराकर सिंहासन पर सो रहा है।
क्यों गूंगे बन गए हम तमाशा देखकर,
क्यों चुप हैं लब हमारे, अन्याय को झेलकर।।
कब तक सहेंगे ये घुटन,
ये अंधेरा इस रात का,
कब तक बिकेगा न्याय यहाँ,
नोट व पाॅवर के साथ का।।
क्या कलम भी अब डरने लगी है लिखने से,
क्या दीपक भी थक गया है खुद जलने से।
नहीं, अब बहुत हुआ, हमें भी जगना होगा,
इस झूठ के महल को मिलकर ढहाना होगा।।
नया आविष्कार नहीं बस हथियार चाहिए,
एक नया विचार, एक नया प्यार चाहिए।
जहाँ सत्य बोले तो पूरा गाँव साथ बोले,
झूठ का एक पत्ता भी न वहाँ पास डोले।।
मेरे मन्नू यूं उठो, आवाज बनो तुम,
सहने वाले नहीं, आगाज बनो तुम।
सत्य हारेगा नहीं, बस वक्त लेगा,
जिस दिन हम जागे, झूठ खुद झुकेगा।।
मुन्ना राम मेघवाल।
कोलिया,डीडवाना,राजस्थान।












