
जहाँ माँ सीता प्रकट हुईं,
हम उस धरा से आते हैं।
जनक दुलारी सिया,
माँ जानकी कहलाती हैं।
मिथिला की धरती पर जब,
अकाल पड़ा था भारी।
ऋषियों ने तब राह दिखाई,
मन में है आस जगाई।
हल ले चले जनक जब,
मिथिला की धरती पर,
जोत लगाई धरा में,
सीत घड़ा से टकराई।
अवतरित हुई माँ सिया,
अद्भुत रूप है छाई।
जनक ने गोद में उठाया,
तीनों लोकों ने मंगल गाया।
गोद में सिया को पाकर,
अश्रुधार हुई माँ सुनैना।
सिया मंद-मंद मुस्काती,
देख अपनी मैया का मुखड़ा।
हल के सीत से मिली सिया,
इसलिए सीता कहलायी।
अकाल मिटा, हरियाली छाई,
खुशियाँ घर-घर आईं।
धरती धन्य हुई मिथिला,
अवतरित हुई सिया सुकुमारी।
मिथिला का सौभाग्य है,
मिथिला की बेटी कहलाई।
रंजीता श्री












