
कर दो भवसागर पार
चतुर्थ स्वरूप माँ कूष्माण्डा, वंदन करने आई हूँ,
डगमग करती जीवन-नैया, तेरी शरण में आई हूँ।
तेरी मुस्कान से फूटा सूरज, जगमग हुआ संसार,
तेरी दिव्य प्रभा ने खोले, सृष्टि-सृजन के द्वार।
अष्टभुजी आदिशक्ति मैया, महिमा अपरंपार,
तेरे तेज से दमक रहा है, धरती और आकाश।
कमंडल, धनुष-बाण सुशोभित, चक्र-गदा की शान,
कमल-पुष्प, अमृत कलश से, दमके दिव्य विधान।
जपमाला के मनकों में माँ, साधना का सार,
तेरी कृपा से खिल उठता है, मन का सूना द्वार।
सूर्यलोक-सी आभा तेरी, स्वर्णिम दिव्य प्रकाश,
तेरे चरणों में मिलता माँ, श्रद्धा को विश्वास।
मोह-लहरियाँ घेर रही हैं, थामो मेरी पतवार,
माँ कूष्माण्डा, हाथ थामकर, कर दो भवसागर पार।
श्रद्धा के सुमन चढ़ाऊँ मैया, चरणों में शीश झुकाऊँ,
अपनी कृपा बनाए रखना, तेरा गुणगान मैं गाऊँ।
डॉ. सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार













