
हे दुर्गे जगदंबे काली, शेरावाली मात भवानी।
मेरी वाणी को देते रहना ,यूं ही एक नई रवानी।
तुम ही जगदम्बा ,गौरी ब्राह्मणी, तुम ही कालरात्रि कहलाती।
कहीं प्रजापति समाज की देवी श्रीयादे अधिष्ठात्री कहलाती।
हे माता तूने भक्त प्रहलाद को हरी मार्ग दिखाया।
जप तप के मार्ग पर धीरज,
संयम रखना सिखलाया।
जोधपुर में जहां दरबार लगता झालामंड।
ज्योति तुम्हारी वहां जलती रहती अखंड।
तुम जीवन में शीतलता देने वाली हो।
अपनी आंचल की छाया में रखने वाली हो।
तुम पीड़ित मानवता के कष्ट दुःखों को हरती हो।
जीव जगत को ममता के आंचल में ढक लेती हो ।
तू ही जगत जननी तू ही सृष्टि का आधार है।
माता तेरे आंचल के बिना जीवन निस्सार है।
जब धरती पर बढ़ता अन्याय
अत्याचार, तुम सिंह आरूढ़ होकर आती हो।
तब तुम दानव दल में , रणचंडी बनकर आहाकार मचा देती हो।
जब भक्तों पर तुम्हारे मुसीबत पड़ती है भारी।
भक्तों के दुखो को हरने में लगा देती हो शक्ति सारी।
तुम शक्ति का हो उद्गम, जीव जगत शक्ति तुमसे ही पाते हैं।
इस सृष्टि में ऋषि संत भक्तजन भक्ति में शक्ति तुमसे ही पाते हैं।
हे मां जगदंबे भवानी सब जन तेरा यशोगान गाते हैं।
अब कर दो कृपा हम तेरे चरणों में शीश नवाते हैं।
रचनाकार
तेज प्रकाश तेजस्वी
कवि ,शायर एवं लेखक, समालोचक एवं समीक्षक चिंतक एवं विचारक, शिक्षाविद् , करियर काउंसलर मोटिवेशनल स्पीकर एवं लाइफ कोच बांदीकुई(रेल नगरी) जिला-दौसा जयपुर(राजस्थान)।













