
चौथी हैं कूष्माण्डा माता,
शब्द तीन से मिलकर बनता।
‘कू’ छोटा, ‘ऊष्मा’ है गर्मी,
अण्डा से ब्रह्माण्ड पनपता।।
जब था चारों ओर तमस,
तब मन्दहास से सृष्टि रची।
आदिस्वरुपा, आदिशक्ति ये,
कहलातीं, धर रुप सची।।
अष्टभुजा में धनुष, कमण्डल,
बाण, कमल पंकज शोभित।
अमृत-कलश, गदा, सुचक्र है,
अष्ट-सिद्धि, नव-निधि वोहित।।
माल धरे कर, सिंह सवारी,
मण्डल सूर्य निवास करे।
मालपुआ, पेठा, कुम्हड़ा प्रिय,
दे आरोग्य, भय-शोक हरे।।
रचनाकार-
पं० जुगल किशोर त्रिपाठी
(बुन्देलखण्ड के प्रसिद्ध साहित्यकार)
बम्हौरी, मऊरानीपुर, झाँसी (उ०प्र०)













