
प्रेम करो, सब से करो,
प्रेम है पूजा, प्रेम है पावन;
प्रेम ही मैं, बस प्रेम ही तू,
मेरे ही राधा, प्रेम ही मोहन —
प्रेम ही भारत की पहचान।
नश्वर तन, चंचल मन,
पंचतत्व से बना हूँ —
पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु और आकाश;
इन्हीं में से मिल जाएगा,
छोड़ अहंकार और विकार, इंसा,
जीवन सफल हो जाएगा।
प्रेम करो, सब से करो,
प्रेम है पूजा, प्रेम है पावन;
प्रेम ही मैं, बस प्रेम ही तू,
मेरे ही राधा, प्रेम ही मोहन —
प्रेम ही भारत की पहचान।
समझ लो और सँभाल लो —
क्या काशी, क्या मथुरा;
चाहे तू हरिद्वार नहा ले,
घूम ले चाहे चारों धाम,
तन का मैल तो धुल जाएगा,
पर मन कंचन कैसे हो पाएगा?
प्रेम करो, सब से करो,
प्रेम है पूजा, प्रेम है पावन;
प्रेम ही मैं, बस प्रेम ही तू,
मेरे ही राधा, प्रेम ही मोहन —
प्रेम ही भारत की पहचान।
तेरा है, मेरा है — कहना छोड़ दे;
ये तो फल है कर्म का।
जीवन मूल्य समझना है तो,
छोड़ दे दुष्ट विचार;
न कुछ लाया था, न ले जाएगा —
साथ जाएगा सिर्फ तेरे कर्म और व्यवहार।
प्रेम करो, सब से करो,
प्रेम है पूजा, प्रेम है पावन;
प्रेम ही मैं, बस प्रेम ही तू,
मेरे ही राधा, प्रेम ही मोहन —
प्रेम ही भारत की पहचान।
आर एस लॉस्टम













