
घिरती जा रही है सांझ,
और मैं देखती हूं, सामने
घिरते अंधियारे को,
पीछे छूटते जा रहे,
हंसी आनंद और उजियारे को।
घिरता जा रहा है सन्नाटा धीरे-धीरे,
फिसलते जा रहे हैँ पल आहिस्ता आहिस्ता।
पुरानी यादें खींचती जाती है
पीछे रह रहकर,
वह साथ, वह बातें,वह चांदनी रातें,
मेरी जिंदगी से तुम्हारा,
कभी ना आने के लिए जाना,
मेरा नई जिंदगी से सुलह
और आगे बढ़ जाना।
जीवन के इस ताने-बाने में
खुद को संभालते संभालते यहां आ गई।
जिंदगी थोड़ी बहुत संभली भी
और बालों में चांदी छा गई!!!
इस निरभ्र अकेलेपन में सोचती हूं
क्या तुम मुझे याद करते हो??
सुलेखा चटर्जी













