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ज़िद है, अब ज़िद से

ज़िद है, अब ज़िद से,
ख़ुद को हारने नहीं देंगे।
समय की रफ़्तार को भी
ख़ुद से आगे निकलने नहीं देंगे।

वक़्त ने बहुत ज़ख़्म दिए,
जुल्म भी जी-भर कर किए हैं;
पर इस बार वक़्त को हम
मनमानी करने नहीं देंगे।

कभी हौसला तोड़ा उसने,
कभी अपनों से दूर किया,
आँसुओं में डुबोकर हमें
बार-बार रुलाया है —
पर इस बार वक़्त को
अपने ऊपर जुल्म करने नहीं देंगे।

कठोर, निठुर, अहंकारी,
अभिमानी, अत्याचारी, निर्दयी वक़्त —
पता नहीं क्यों
बिन वजह मुझसे दुश्मनी निभाता है;
पर इस बार,
हम उसे जितने नहीं देंगे —
बल्कि, इस बार
उसको मज़ा चखाएँगे!

आर एस लॉस्टम

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