
प्रेम में मृत्यु है,
मुक्ति नहीं —
ऐसा कहते हैं लोग।
और सच भी है,
प्रेम में सचमुच
एक मृत्यु होती है।
अहंकार की मृत्यु,
स्वार्थ की मृत्यु,
‘मैं’ की ऊँची, कठोर
दीवारों की मृत्यु।
जब कोई उतरता है प्रेम में,
वह वैसा नहीं रहता
जैसा पहले था।
उसका तर्क धीमा पड़ जाता है,
अभिमान राख हो जाता है,
और अकेलापन—
धीरे-धीरे
अपना नाम खो देता है।
पर प्रश्न अब भी खड़ा है—
क्या यह मृत्यु
बंधन है?
या मुक्ति?
कहते हैं—
प्रेम बाँधता है।
यादों से,
प्रतीक्षा से,
पीड़ा की महीन डोरियों से।
प्रेम में डूबा मन
स्वतंत्र नहीं रहता,
वह किसी एक की धड़कनों का
बंधक हो जाता है।
पर यदि
‘मैं’ सचमुच मर जाए,
और ‘हम’ जन्म ले—
तो क्या वह भी
एक नई स्वतंत्रता नहीं?
शायद प्रेम में मृत्यु है—
पर वही मृत्यु
एक नए जीवन का द्वार भी है।
राख से उठती हुई
एक शांत, उजली
पहचान।
प्रेम में मृत्यु है—
पर संभव है,
उसी मृत्यु में
आत्मा का पहला जन्म छिपा हो।
आर एस लॉस्टम













