
उठो सवर्ण, करो कुछ अब तो,
अब पूनम की रात नहीं।
स्याह रात में पनप रहे हैं,
दुष्ट हजारों नाम नहीं।।
आरक्षण के धार से कट कर,
कब तक खून ,बहाओगे।।
स्नेह यदि अपने बच्चों से,
तुम विरोध में आओगे।।
बांध दिया ,सवर्ण बच्चों को
सौ प्रतिसत की बोरी से।
चालीस प्रतिसत पा कर, लूटे,
सारा माल तिजोरी से।।
चौपट नगरी में, गदहे दौडे,
सब घोड़ो को बांध दिया।
सूरज को ढकने के खातिर,
जुगनु का सैलाब चला।।
राणा की तलवारों को,
वापस म्यानों में डाल दिया।
विश्र्व गुरु की राह में तुमने,
चट्टानों को डाल दिया।।।।
सहन शक्ति की और परिक्षा,
अब आगे ना हो पाएगा।
अपने स्वाभिमान के खातिर,
अब सवर्ण लड़ जाएगा।।
वंदे मातरम्,
डा शोभा त्रिपाठी शैव्या













