
विषय- माँ
विधा- कविता
बहुत बिखरी बहुत टूटी,
न अपनों से कभी रूठी।
नाज़ुक दिल था सुकोमल थी,
कभी काया भी ये मेरी।
इन बालों की सफ़ेदी को,
जरा तुम गौर से देखो।
इन बालों की सफ़ेदी को,
लेकर मैं नहीं जन्मी।
बड़ी तारीफें क़ाबिल लगती थी,
तुम्हें ये जुल्फो की घटा मेरी।
ये चमड़ी जो दिख रही है,
तुम्हे ये झुर्रियों वाली।
माँ कभी तुमको लगती थी,
देवी की मूरत से कहीं प्यारी।
माँ कभी दोस्त, कभी जन्नत,
जो लगती थी।
अब क्यों बोझ लगती है।
आज जो ले आये हो वृद्धाश्रम,
पकड़कर उंगलियाँ मेरी।
कभी मैंने ही चलना सिखाया था,
पकड़कर उंगलियाँ तेरी।
मैं भी तो कामकाजी थी,
मिलता जो वक़्त थोड़ा,
काम से मुझको।
झटपट फोन मैं घर पर,
अपने लगाती थी।
बस तुझको पूछती थी,
ख्याल ठीक से रखना,
बच्चों का मेरे।
एक ही बात करती थी।
अब न ही मैं कामकाजी हूँ।
न ही तो तुम अब बच्चे हो।
कभी अब पास बैठने की, तुम्हें फुर्सत नहीं मिलती।
रचनाकार- श्रीमती सुनीता बोपचे सिवनी (म प्र)









