
मस्तक बड़ा हो, सोच भी बड़ी हो,
मन में करुणा, दृष्टि खड़ी हो,
गणपति कहते—ज्ञान वही है,
जिसमें विनय की ज्योति जगी हो।
बड़े-बड़े कान मिले हैं हमको,
हर पीड़ा को सुनना सीखो,
शब्दों से पहले मौन समझकर,
दर्द किसी का चुनना सीखो।
छोटी आँखें कहती हैं हमसे,
लक्ष्य से नजर हटाना मत,
राह कठिन हो, रात घनी हो,
अपने कदम रुकवाना मत।
एकदंत की यही पुकार है—
जो व्यर्थ है, उसको त्यागो,
टूटे सपनों की किरचों से भी,
जीवन का दीपक फिर जागो।
बड़ा उदर सिखलाता हमको,
सुख-दुख दोनों सहना होगा,
कड़वी बातें पीकर भी फिर,
मन में प्रेम ही रखना होगा।
मूषक पर बैठा गणनायक,
इच्छाओं पर संयम सिखाते,
मन कितना भी चंचल हो पर,
हम अपने स्वामी बन जाते।
माता-पिता में जगत देखकर,
गणपति ने यह बात बताई—
जिसने अपने मूल को पूजा,
उसने सच्ची राह कमाई।
हे विघ्नहर्ता! इतनी शक्ति दो,
अहंकार कभी मन में न आए,
ज्ञान मिले तो विनम्र रहें हम,
सफलता सिर पर न चढ़ पाए।
तेरे चरणों से यही सीख है—
जीवन केवल जीत नहीं है,
दूसरों के आँसू पोंछ सकें,
इससे बड़ी कोई प्रीत नहीं है।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र









