
हम सब के जीवन से,
जंगल जा रहे है।
बचा सको तो बचा लो।
जंगल जा रहे है।
न जाने क्यों,
लोग उनके एहसान को भूलते जा रहे है।
अपने स्वार्थ के लिए,
लोग जंगलो की बलि चढ़ा रहे है।
जंगल जा रहे है।
कई औषधियाँ है उन जंगलो में छिपी,
इस राज को अपने जेहन से क्यों मिटा रहे है।
वन्य जीवों का वहाँ पर है बसेरा।
क्यों उन्हें शहरों की ओर भागने को उकसा रहे है।
बिन सोचे समझे यह क्या कदम उठा रहे है।
हमारी वजह से हरे भरे जंगल लुप्त होते जा रहे है।
जंगल जा रहे है।
पेड़ काटने की सजा है ये गर्मी,
और हम इसी से घबरा रहे है।
जबकि पानी की बर्बादी का हिसाब भी है अभी बाकी,
धरती को भी तो हम ही जहर युक्त बना रहे है।
जाने अनजाने हम सब,
पर्यावरण के साथ बहुत गलत किए जा रहे है।
जंगल जा रहे है।
बचा सको तो बचा लो।
जंगल जा रहे है।
मंजू अशोक राजाभोज
भंडारा (महाराष्ट्र)












