
माता औ मातृभूमि का कैसे,
हम उपकार भुला सकते हैं।
दोनों से हमें मिला जीवन,
गोदी में पल बढ़ हंसते हैं।।
दे पय जो माँ ने सींचा था,
ममता का अमृत बरसा कर।
त्यों पर्यावरण बचाऊंगा,
वृक्षारोपण संरक्षण कर।।
मन शीतल छाया जीवन की,
मातृभूमि हमारी शान है।
पूजनीय, दोनों मेरी माँ,
इसका हमें अभिमान है।।
मां की सुखद गोद जैसी,
वृक्षों की हरियाली होती है।
धरती मां को मिलता सुकूँ,
सारे जग खुशहाली होती है।।
एक माँ दुनिया को छोड़ गई,
दूजी माँ हमको पाल रही,
परोपकारी बनकर जीना,
जो प्रेम त्याग की मिसाल रही।।
जब भी कोई वृक्ष लगता हूं,
माँ का स्मरण हो आता है।
वो कहती, सिर्फ इक पेड़ नहि,
कई पक्षियों का घर होता है।।
मां ने हमको सदा सिखाया,
पेड़ पौधे प्रकृति धरोहर है।
जल जंगल जमीन से जीवन है,
नव पीढ़ी की खुशी मनोहर है।।
बस एक अपील सबसे मेरी,
मां के प्रति श्रद्धा रखना सदा।
एक पेड़ लगाए मां के नाम,
जो जग कल्याण करें है सदा।।
भगवानदास शर्मा “प्रशांत”
शिक्षक सह साहित्यकार
इटावा उत्तर प्रदेश












