
विश्व पर्यावरण दिवस
यूँ जो मौन खड़े दिखते हो ,
सबको खड़े बस एक जगह पर।
सबकी साँसों में जीवन बन,
हर पल चलते रहते हो।
बन हवा जीवन फैलाते ,
तुम इस सारी धरती पर।
तुम जीवन के सच्चे साथी ,
हर क्षण साथ निभाते हो।
जब-जब दुनिया छोड़ गई,
तुम संग खड़े रहते हो।
तेरी छाया में बचपन बीता,
तेरी शाखों पर सपने झूले।
धूप जली तो छाँव बना तू,
प्यास लगी तो शीतलता दी।
पत्थर खाकर फल देते हो,
कैसा है यह प्यार निराला।
अपने दुख को छुपा कर रखते,
सबको देते सुखों की माला।
तेरा ऋण मैं कैसे चुकाऊँ।
तेरी ममता माँ सी लगती,
थककर आऊँ जब मैं पास तुम्हारे,
जब जब दर्द तुझे होता है,
मेरा दिल भी रो पड़ता है।
रचनाकार- श्रीमती सुनीता बोपचे सिवनी (म प्र)












