
विगत वर्ष की याद आई घटना,
कैसा प्राणी संहार हुआ था।
हैदराबाद की घटना स्मृति कर,
द्रवित मन करुण भाव छुआ था।।
कैसे विकास के नाम पर ही,
प्राधिकरण ने करी तबाही थी।
हजारों जेसीबी ट्रक गरजे थे,
जीवो पर आफ़त भरपाई थी।।
उस घटना ने झकझोर दिया,
क्यों मानव लालच में अंधे हो,
कंक्रीट के जंगल खड़े किए,
क्या दिखता नहीं तुम अंधे हो।।
सुन विचलित व बेचैन था मन,
कई एकड़ जंगल जल गए थे।
और अगले दिन की सुर्खी थी,
लाखों जीव जब जल गए थे।।
पर्यावरण का नुकसान न हो,
मेरा बहुत द्रवित हुआ था मन।
पर्यावरण का विनाश हो यदि,
वो विकास नहीं, है पागलपन।।
आशंकित हुए सब जीव जंतु,
सोचे! क्यों मेरे घर उजाड़ दिए।
कहे इस धरती पर मेरा भी हक़,
मैट बहु मंजिल निर्माण किए।।
क्या इंसानियत तुममें बची नहीं,
लालच को कितना बढ़ा लिया।
पेड़ काट,अब छाया को तरसते,
धरती का तापमान बड़ा लिया।।
पंछी पखेरू को भी जगह नहीं,
कच्चा मका औ छप्पर मैट दिए।
हरे पेड़ों को भी काट-काट कर,
तुम ने स्वयं स्वार्थ भेंट किए।।
कहते, धरती के तुम श्रेष्ठ सृजन,
स्वार्थी विनाश की मोड़ पर हो।
करते विनाश स्वयं के हाथों ही ,
कैसी विकास की होड़ में हो।।
भगवान दास शर्मा ‘प्रशांत’
शिक्षक सह साहित्यकार
इटावा उत्तर प्रदेश












