Uncategorized
Trending

हरियाली फैलाएँगे, पर्यावरण बचाएँगे


(कविता)


पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है,
मानव स्वास्थ्य खो रहा है।
कूड़ा-कचरा धरा के गर्भ में गाड़ कर
मानव स्वयं विषाक्तता बो रहा है।

यह जो प्रकृति पर अत्याचार कर रहे हैं,
असल में यह अत्याचार निज प्राणों पर हो रहा है।
प्रकृति से प्रेम करो, पेड़ों से यह धरा भरो,
अन्यथा साँस न ले पाएँगे।

इसीलिए कहती हूँ मित्रों,
हरियाली फैलाएँगे, पर्यावरण बचाएँगे।

ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रहा है,
ग्लेशियर सारा पिघल रहा है।
ओज़ोन परत का पता नहीं,
ऐसे छिद्र हो रहे हैं।
पौधे न लगाएँगे तो
सब जान से जाएँगे।

इसीलिए कहती हूँ मित्रों,
हरियाली फैलाएँगे, पर्यावरण बचाएँगे।

प्राकृतिक आपदा सहते जा रहे हैं,
आँधी-तूफ़ान आ रहे हैं।
भूकंप हलचल मचा रहे हैं,
सूखा-बाढ़ सता रहे हैं,
धरती को रुला रहे हैं।

धरती है माता हमारी, इसको न रुलाएँगे।
इसीलिए कहती हूँ मित्रों, मिलकर बीड़ा उठाएँगे —
हरियाली फैलाएँगे, पर्यावरण बचाएँगे।

— ममता साहू
कवयित्री एवं लेखिका
कांकेर, छत्तीसगढ़

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *