
कट रहे जंगल, सूख रही नदियाँ,
साँसों में घुल रहा है ज़हर यहाँ।
धरती माँ पूछे हमसे रोकर,
बोलो क्या यही है विकास यहाँ?
पेड़ थे जो घर पंछियों का,
उनको हमने श्मशान बना दिया।
नदी थी जो जीवन देती थी,
कूड़े से हमने कब्रिस्तान बना दिया।
एसी की ठंडी हवा में बैठे,
भूल गए पीपल की छाँव को।
प्लास्टिक की दुनिया में खोकर,
खो दिया मिट्टी की गंध को।
बच्चे पूछेंगे एक दिन हमसे,
तितली कैसी होती थी बाबा?
चिड़िया का चहकना क्या था,
बारिश की खुशबू क्या थी बाबा?
अब भी वक्त है जाग जाओ,
एक पेड़ लगाओ नाम से।
नदी-ताल को साफ करो,
जीवन बचाओ अपने काम से।
धरती नहीं विरासत हमारी,
बच्चों से लिया है उधार।
लौटानी है हरी-भरी इसको,
ये ही है सबसे बड़ा त्योहार।
पॉलीथिन को ना कह दो,
पानी को व्यर्थ ना बहाओ।
हरियाली को दोस्त बनाओ,
प्रकृति का कर्ज चुकाओ।
मक़ता:
“अमन” कहे अब चेत जाओ,
प्रकृति से न करो तकरार।
पेड़ लगाओ, जल बचाओ,
तभी बचेगा ये संसार।
संदेश:
एक दिन पर्यावरण दिवस मनाने से कुछ नहीं होगा।
हर दिन को पर्यावरण दिवस बनाओ।
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)












