
औपचारिकता मात्र है पर्यावरण पर कलम चलाना
छदम सुख के लिए नदी तालाब जंगल खेत सबको ही है मिटाना
इंसान की फितरत देखो प्रकृति का भरपूर क्षरण कर रहा है
प्राकृतिक आपदा पर घड़ियाली आँसु बहा रहा है
विकास के नाम पर पहाड़ जंगल काट रहा है
इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर नदी तालाब खेत पूर रहा है
नदी तालाब पहाड़ खेत मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति का ईश्वरीय उपहार है
मूर्ख मनुष्य इन्हे उजाड़ जिस डाल बैठा उसी को काटने तैयार है
मनुष्य खुद की प्यास बुझाने वाली नदियों को दूषित करने आमादा है
शुद्ध वायु देनेवाले हरे भरे वृक्ष पहाडों को निपटाने का मुख्य प्यादा है
ये फर्ज़ी स्वांग ना कर तू प्रकृति से विनाश हो जायेगा
चेत जा ए मूर्ख धरती माँ से विलग कहीं पनाह ना पायेगा
दस बाय दस का मकान सड़क ही से ही गुजारा कर ले
अधिक औलाद का मोह छोड़ जनसंख्या को नियंत्रित कर ले
आज धरती माँ को सहेज ले कल तेरा सँवर जायेगा
हरी भरी धरा मे नैसर्गिक सौंदर्य छा जायेगा
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र












