
नन्हे हाथों ने मिट्टी को जब प्यार से छुआ,
सूनी धरती का चेहरा फिर से खिल उठा,
एक पौधे के संग उम्मीद भी बोई गई,
मानो जीवन की नई कहानी संजोई गई।
बच्चों की मुस्कानों में कल का सवेरा है,
हर पौधे में छिपा प्रकृति का बसेरा है,
माँ-सी धरती ने जब यह दृश्य निहारा,
उसकी आँखों में भी उमड़ पड़ा उजियारा।
कितना रोई होगी वह कटते जंगल देखकर,
सूखी नदियाँ और बंजर आँगन देखकर,
आज इन्हीं हाथों ने उसका दर्द बाँटा है,
हर पौधे से प्रेम का दीपक जलाया है।
ये पौधे केवल हरियाली नहीं लाएँगे,
आने वाली पीढ़ियों को साँसें दे जाएँगे ,
इनकी छाँव में सपने भी पनपेंगे,
पक्षियों के गीत फिर से गूँजेंगे।
आओ, धरती का यह ऋण चुकाएँ हम,
हर मौसम में एक पौधा लगाएँ हम,
ताकि आने वाला हर कल यह कह सके—
“कुछ लोगों ने प्रेम बोया था,
तभी आज यह संसार हरा-भरा है।”
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र












