
करो परिवेश रक्षा सभी मिलजुल
आगे बढ़कर निकालो कोई हल।।
मत काटो हमें ,हमें जीने दो
वायुमंडल में प्राण वायु बहने दो
हमसे ही चलता जीवन धन
वृक्षों से ही मिलता वस्त्र भोजन
प्राप्त कर लेना हमसे मीठे फल।।
आगे बढ़कर निकालो कोई हल।।
नदियां बहती जाए करें छल छल
मत मिलाओ जहर अमृत है जल
मत प्रदूषित करो मत प्रदूषित करो
मेरे तन में नहीं तुम जहर को भरो
एक कोशिश करो रखो जल निर्मल
आगे बढ़कर निकालो कोई हल।।
बहती हवा भी कहे कुछ गुनगुना के,
दुनिया को कुछ इस तरह सुना के
घोट डालेगी यह तो तेरे वक्ष को,
मिटा देगी दुनिया से तेरे अश्क को
वायुमंडल को रखो सदा निर्मल
आगे बढ़कर निकालो कोई हल।।
धरती की है यहकरुण पुकार,
करो मत मेरा श्रृंगार वेकार।
मै जगतजननी,मै अन्न की दाता,
क्यों बनाया है मुझको पीड़ा दाता
करो मुझे कुछ स्वच्छ धवल।।
आगे बढ़कर निकालो कोई हल।।
प्रकृति के लिए कुछ संवेदन बनो
प्रकृति के लिए खर्च कुछ धनकरो
लगाओ वृक्ष और उन्हें जल दो
समाधान यही बस संरक्षण करो,
संरक्षण से ही होगा श्रेष्ठ तेरा कल
आगे बढ़कर निकालो कोई हल।।
करो पर्यावरण की रक्षा सब मिल
आगे बढ़कर निकालो कोई हल।।
पुष्पा पाठक छतरपुर मध्य प्रदेश












