
हज़ारों कांटों से दामन चमन का सजा लिया,
गुलों से छीनकर रंग बारूद में मिला लिया।।
वो पूछते हैं कि धरा की शक्ल का आकार क्या है?
जिन्होंने जंगलों को ही नक्शों से मिटा लिया।।
अज़ीज़ थीं जो हवाएं मेरी शाम-ओ-सुबह की,
धुएं का ज़हर उनमें सांसों ने कमा लिया।।
नवाज़िशें जो प्रकृति की थीं वफ़ा के जैसी,
क़त्ल-ए-शजर करके इंसान ने ख़ुद को गंवा लिया।।
धरा को बचाने की तड़प अब भी मौन है क्यूँ?
जब ज़मीन ने ख़ुद को मरुस्थल बना लिया।।
रजनी कुमारी
लखनऊ उत्तर प्रदेश












