Uncategorized
Trending

गज़ल – कभी तुम याद न आना

वक्त गुजरा है जो मेरा, कभी तुम याद न आना,
बिछड़ गया हूं मैं उससे, कभी तुम याद न आना।

तेज बारिश में लिपट जाना, उसकी बालों को सहलाना,
रात शमां बुझा जाना, कभी तुम याद न आना।

कितनी नजदीक थी मेरी, दिले गुलबाग रहता था,
उसका नंगे पांव चले आना, कभी तुम याद न आना।

शहर में उसके था जो मौसम, बड़ा सुहाना होता था,
मौसम की तरह उसका बदलना, याद न आना।

आंखें झील सी थी उसकी, जिसमें मैं डूब जाता था,
उसकी आंखों का पानी सूख जाना, याद न आना।

वो जब आती थी तो खुशबू, हवाओं में बिखरती थी,
उसका हर बातों में मुस्काना, कभी तुम याद न आना।

अदाएं थी उसकी ऐसी, दीवाना कर ही जाता था,
बिखड़ी जुल्फें सजा जाना, कभी तुम याद न आना।

तड़पते दिल से मिलने की, बहाना थी मेरी वो मगर,
बिछड़ना बेवफ़ाई से, कभी तुम याद न आना।

बागों में बहारें थी, साथ में बैठा करते थे,
उन बागों का मुरझाना, कभी तुम याद न आना।

जो सपने साथ देखे थे, वो आँखों में ही टूटे हैं,
उन सपनों का बिखर जाना, कभी तुम याद न आना।

वक्त गुजरा है जो मेरा, कभी तुम याद न आना,
बिछड़ गया हूं मैं उससे, कभी तुम याद न आना।

रवि भूषण वर्मा
राँची झारखंड

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *