
वक्त गुजरा है जो मेरा, कभी तुम याद न आना,
बिछड़ गया हूं मैं उससे, कभी तुम याद न आना।
तेज बारिश में लिपट जाना, उसकी बालों को सहलाना,
रात शमां बुझा जाना, कभी तुम याद न आना।
कितनी नजदीक थी मेरी, दिले गुलबाग रहता था,
उसका नंगे पांव चले आना, कभी तुम याद न आना।
शहर में उसके था जो मौसम, बड़ा सुहाना होता था,
मौसम की तरह उसका बदलना, याद न आना।
आंखें झील सी थी उसकी, जिसमें मैं डूब जाता था,
उसकी आंखों का पानी सूख जाना, याद न आना।
वो जब आती थी तो खुशबू, हवाओं में बिखरती थी,
उसका हर बातों में मुस्काना, कभी तुम याद न आना।
अदाएं थी उसकी ऐसी, दीवाना कर ही जाता था,
बिखड़ी जुल्फें सजा जाना, कभी तुम याद न आना।
तड़पते दिल से मिलने की, बहाना थी मेरी वो मगर,
बिछड़ना बेवफ़ाई से, कभी तुम याद न आना।
बागों में बहारें थी, साथ में बैठा करते थे,
उन बागों का मुरझाना, कभी तुम याद न आना।
जो सपने साथ देखे थे, वो आँखों में ही टूटे हैं,
उन सपनों का बिखर जाना, कभी तुम याद न आना।
वक्त गुजरा है जो मेरा, कभी तुम याद न आना,
बिछड़ गया हूं मैं उससे, कभी तुम याद न आना।
रवि भूषण वर्मा
राँची झारखंड










