
रात की बारिश में जब घर की छत टपकती रही,
माँ की यादों की कोई चादर सिसकती रही।
बंद कमरों में बहुत शोर था ख़ामोशियों का,
एक तस्वीर दीवारों से उतरती रही।
बूँदें खिड़की पर कई किस्से सुनाती थीं मुझे,
उम्र बीते दिनों की आँखों में चमकती रही।
जिसे अपना कह के सीने से लगाया था कभी,
उसकी याद एक चुभन बनकर धड़कती रही।
रात भर नींद मेरी दहलीज़ पे बैठी रही,
और तन्हाई मेरे साथ टहलती रही।
सुबह आई तो सभी पेड़ों पे उजाला बिखरा,
मेरे भीतर मगर एक रात ठहरती रही।
रात की बारिश ने इतना तो सिखाया मुझको,
चोट गहरी हो तो आँखें भी बरसती रहीं।
रीना पटले शिक्षिका
शासकीय हाई स्कूल ऐरमा कुरई
जिला सिवनी मध्यप्रदेश










