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जीना भूल गए हैं हम

धुआं -धुंआ सा है ये ज़िन्दगी
कहीं छांव तो कहीं धूप है ये ज़िन्दगी
सच ज़िंदगी की इस भागमभाग की दौड़ में
कहां से कहां आ गए हैं हम
बिल्कुल हम जीना भूल गए हम
इतनी जिम्मेदारियां का बोझ आन पड़ा
खुद के लिए वक्त ही नहीं मिलता
खुलकर हंस भी नहीं पाते
सिर्फ पैसों की चाहत में सब कुछ हम गंवा बैठे
बस हमारी चाह रही ऊंचे ऊंचे ख्वाबों को देखना
अपनी बड़ी -बड़ी कोठी हो, मोटर गाड़ी हो, ए.सी हो
इन सब की चाहतों में हम कहां से कहां आ गए
पर वो रिश्ते-नाते, सभी परिवार के संग मिलकर हंसना- बोलना वो प्यार की बातें
वो सब न जाने कहां गायब हो गया
उन माता-पिता को आज हम भूल गए हैं
जिन्होंने लाड़ -प्यार से पाला,पलकों पर बिठाया
उनकी सेवा के लिए आज वक्त नहीं
बच्चे खूब कार्टून देखते, एनिमेशन फिल्म देखते
वो अब दादा-दादी, नाना -नानी की
कहानियां और उनका प्यार अब भूल गए
सच-सच इस जीवन के आपाधापी दौड़ में
सब सुध -बुध खो दिए हैं
कामकाज के चक्कर में सारे रिश्तों को भूल गए
आज रिश्ते फार्म हाउस और होटलों में
सिमट कर रह गए
उस ईश्वर को भी भूल गए हैं
जिसने हमें इस संसार के लिए रचा है
हे ईश्वर! इतनी सी विनती है कि हमें अपना आशीष दो कि इस व्यस्ततम जिंदगी में सब कुछ निभा सकूं

डॉ मीना कुमारी परिहार

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