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एक अधूरा सपना

कल तक जिन आँखों में सपनों का उजाला था, आज उन्हीं राहों पर दर्द का अँधियारा है।

जो घर से निकले थे एक सुनहरे कल की तलाश में, किसे पता था कि वो लौटेंगे केवल यादों में।

किताबें अब भी खुली होंगी, कॉपियों में अधूरे शब्द होंगे, माँ की दुआएँ आज भी दरवाज़े पर खड़ी होंगी, पर लौटने वाले कदम अब नहीं होंगे।

किसी ने डॉक्टर बनने का सपना देखा था, किसी ने अफ़सर बनने का, किसी ने माँ-बाप के संघर्षों को खुशियों में बदलने का।

पर नियति ने ऐसा पन्ना पलटा, कि सपने आँसुओं में बदल गए।

आज चाँद भी कुछ उदास होगा, तारे भी ख़ामोश होंगे, क्योंकि कई मासूम ख़्वाब समय से पहले सो गए।

ईश्वर दिवंगत आत्माओं को अपने श्रीचरणों में स्थान दें और शोकाकुल परिवारों को यह असहनीय दुःख सहने की शक्ति प्रदान करें।

“कुछ दीपक आँधी से नहीं, लापरवाही से बुझ जाते हैं। और उनके साथ न जाने कितने सपने राख बन जाते हैं।”

भावपूर्ण श्रद्धांजलि।

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