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दाम बढ़े, सपने घटे

दाम बढ़े, सपने घटे, कैसी चली बयार,
महंगाई के इस मौसम में, रोता हर परिवार।

दाम बढ़े, सपने घटे, कैसी चली बयार,
आम आदमी ढूँढ़ रहा है, जीने का आधार।

कल तक जो सब्ज़ी सस्ती थी, आज हुई अनमोल,
तेल, दाल और आटे ने भी, बदले अपने मोल।

खाली जेबें पूछ रही हैं, कब होगा उद्धार,
महंगाई के इस मौसम में, रोता हर परिवार।

दाम बढ़े, सपने घटे, कैसी चली बयार,
आम आदमी ढूँढ़ रहा है, जीने का आधार।

बेटी की मुस्कान में भी, चिंता की रेखाएँ,
बेटे की पढ़ाई पर भी, खर्चें की घटाएं।

छोटे-छोटे अरमानों पर, पड़ती बार-बार मार,
महंगाई के इस मौसम में, रोता हर परिवार।

नेता देते भाषण लंबे, वादों की भरमार,
लेकिन जनता पूछ रही है, कब बदले संसार?

रोटी, कपड़ा और मकाँ का, बढ़ता जाता भार,
महंगाई के इस मौसम में, रोता हर परिवार।

फिर भी दिल में आस जगी है, होगा नया सवेरा,
मेहनतकश के चेहरे पर फिर, चमकेगा उजियारा।

संघर्षों की राहों में भी, रखता है विश्वास,
एक दिन फिर लौटेगा खुशियों की मधुमास।

दाम बढ़े, सपने घटे, कैसी चली बयार,
महंगाई के इस मौसम में, रोता हर परिवार।

फिर भी हिम्मत,हार न मानो, हो जाएगा बेड़ा पार,
आम आदमी की मेहनत से, बदलेगा फिर से संसार।

      रीना पटले,शिक्षिका
शासकीय हाई स्कूल ऐरमा कुरई 
    जिला सिवनी मध्यप्रदेश

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