
दिग्पाल छंद
मैंने तुम्हें पुकारा,दे दो मुझे सहारा।
नइया फँसी भंँवर में,कैसे मिले किनारा।।
रघुवर करूंँ विनय है,प्रभु साथ दो हमारा।
मझधार से निकालो,हो कष्ट दूर सारा।।
सत्कर्म की डगर पर,बढ़ते रहें कदम है।
सदबुद्धि दो कन्हैया,आए नहीं अहम है।।
आराधना करूँ नित,घेरे कभी न गम है।
देना सदा सहारा,दूरी रहे वहम है।।
आई शरण तुम्हारी,जग से मिला छलावा।
कोई नहीं सहारा,प्रभु आपके अलावा।।
दर पर खड़ी पुकारूंँ,विनती सुनो हमारी।
बस कामना यही है,दर्शन मिले मुरारी।।
संकट पड़ा कभी तो,तुमको रही पुकारी।
हे नाथ छत्र छाया,मुझ पर सदा तुम्हारी।।
ऐसी कृपा सुता पर,प्रभुवर रहे हमेशा।
बनकर सदा सहारा, काटो सभी कलेशा।।
शुभ कर्म के उदय से,आशीष सिर धरूँ मैं।
तप त्याग साधना से,उर में खुशी भरूंँ मैं।।
कोई दुखी दिखे तो,पीड़ा सदा हरूंँ मैं।
माता-पिता गुरू को,हरपल नमन करूंँ मैं।।
सद्मार्ग पर चले हम,सबको गले लगाएँ।
यह स्वर्ग सी धरा है,बस हौसला बढ़ाएंँ।
सौहार्द भावना हो,ऐसी मुहिम चलाएंँ।
सबका बनें सहारा,दुनिया नई बसाएँ।।
डॉ गीता पाण्डेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश










