
ओ मेरी बिटिया,
ओ मेरी प्यारी बेटी,
तूने कितनी ही मुश्किलें झेलीं,
कितने ही तूफ़ानों से बेख़ौफ़ लड़ी।
फिर भी हर बार,
तू और मज़बूत, और मज़बूत होती गई।
मैं जानता हूँ तेरा मन सच्चा और ईमानदार है,
और ईमानदारी, मेरे बच्चे,
ईश्वर को यही सबसे बड़ी निजामत है।
यही रब की सबसे
बड़ी इबादत है
दयालु बन, विनम्र बन,
तो जीवन राह आसान कर देगा;
दया को अपना ध्येय बना ले,
कोई भी तूफान देर तक न टिकेगा।
कभी दुखी मत होना,
सिर सदा शान से ऊँचा रखना,
अपनी आत्मा को नेक रखना,
अपना स्वाभिमान बनाए रखना।
और सबसे प्रेम करना,
क्योंकि प्रेम एक अनमोल खुशबू है —
इसे खुलकर, धीरे से,
हर दिशा में फैलाते रहना।
राम वल्लभ गुप्त’इंदौरी’










