
घर से दूर थे वो, सपनों के शहर में,
माँ-बाप की उम्मीदें थीं उनकी नज़र में।
पढ़ने गए थे, कुछ बनकर लौटने को,
किस्मत ने बुला लिया उन्हें बीच सफ़र में।
किसी ने खेत बेचा था, किसी ने गहने गिरवी रखे,
किसी पिता ने अपने अरमान बच्चों की राह में रखे।
माँ ने विदा करते समय बस इतना कहा था,
“बेटा, पढ़-लिख लेना, यही उनका सपना था।”
छोटे-से कमरे में रहकर, रातों को जागते थे,
थककर भी किताबों से अपने रिश्ते नापते थे।
आँखों में आईएएस, डॉक्टर, इंजीनियर के ख़्वाब थे,
उनके सपनों के आगे सारे दुख भी बेहिसाब थे।
घर से दूर थे वो, सपनों के शहर में,
माँ-बाप की उम्मीदें थीं उनकी नज़र में।
पढ़ने गए थे, कुछ बनकर लौटने को,
किस्मत ने बुला लिया उन्हें बीच सफ़र में।
किसे पता था ज्ञान की राहों में ऐसा अँधेरा होगा,
एक पल में हँसता-खेलता जीवन यूँ बिखरा होगा।
अब गाँव की पगडंडी उनकी राह निहारेगी,
माँ की आँखें हर आहट पर दरवाज़ा ताकेंगी।
पिता चुपचाप तस्वीरों को सीने से लगाएँगे,
और अधूरे सपनों का बोझ उम्र भर उठाएँगे।
न कोई परीक्षा बाकी थी, न कोई परिणाम मिला,
बस दर्द का एक समंदर हर परिवार को मिला।
घर से दूर थे वो, लेकिन दिल घर में रहता था,
हर संघर्ष के पीछे बस परिवार का चेहरा था।
लौटना था सफल होकर, सम्मान के साथ एक दिन,
पर लौटे तो ख़ामोशी में, आँसुओं के साथ एक दिन।
लखनऊ की उस आग ने न सिर्फ़ कुछ जानें लीं,
उसने माँ की हँसी, पिता का गर्व, बहन की राखी भी छीन ली।
उन सभी विद्यार्थियों को विनम्र श्रद्धांजलि, जो घर से दूर अपने सपनों के लिए संघर्ष करते हुए असमय इस दुनिया से विदा हो गए।
रीना पटले शिक्षिका
शासकीय हाई स्कूल ऐरमा कुरई
जिला सिवनी मध्यप्रदेश










