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वीर रस में रचना: “खड़ावदा की ललकार”


हुंकार
आज भी खाली रहते खड़ावदा के कई मंच,
बहुत से कार्यक्रम में नहीं पहुँच पाते हमारे सरपंच।
जनपद प्रतिनिधि न जाने कहाँ खो गये,
जिला पंचायत सदस्य लगता है गहरी नींद में सो गये।

आदरणीय विधायक जी का तो खड़ावदा पर नहीं है ध्यान,
सांसद महोदय तो चम्बल के किनारे से ही हैं परेशान।
अब हम अपनी समस्या किसे बतलाएँ,
खड़ावदा में नल-जल वितरण में भी भेदभाव आए।

अतिक्रमण का फैला पूरे गाँव में जाल,
खड़ावदा में नर-नारी का है बहुत बुरा हाल।
बस यहाँ चम्मचे-चुगलखोरों की गलती है दाल,
अपने गाँव का बहुत बड़ा है नाम खड़ावदा नोमामिल।

वीर-घोष
पर सुनो खड़ावदा वालो! कब तक सहोगे अत्याचार,
कब तक सोएगा तुम्हारा सिंह-सा दहाड़ता विचार?
बस यहाँ के लोगों का बहुत कमजोर है दिल,
तो बदलो इस दिल को, बना दो इसे बिजली-सा किल!

अपने गाँव का सरकारी दवाखाना लावारिस हो गया,
अपने गाँव के जनप्रतिनिधि न जाने कहाँ खो गया।
आज तक न बन पाया खड़ावदा में मुक्तिधाम,
तो क्या हम यूँ ही रोते रहेंगे सुबह-शाम?

रणभेरी
उठो खड़ावदा के जवानो! छोड़ो अब ये मौन,
जिस मिट्टी में जन्म लिया, उस पर करना है गौन।
नल-जल में भेदभाव जो करे, उसका हाथ पकड़ो,
अतिक्रमण के जाल को, एकजुट होकर जकड़ो।

चम्मचे-चुगलखोरों की अब नहीं गलेगी दाल,
जब गाँव का हर बच्चा पूछेगा सवाल।
सरपंच से सांसद तक, सबका देना है हिसाब,
क्यों खड़ावदा की किस्मत में लिखा है बस ख्वाब?

संकल्प
अब नहीं रहेगा लावारिस कोई दवाखाना,
हर चौपाल पर होगा विकास का तराना।
मुक्तिधाम भी बनेगा, और बनेगी नई सड़क,
जब खड़ावदा की जनता देगी हुंकार कड़क।

नाम बड़ा है खड़ावदा, अब काम भी बड़ा होगा,
हर घर से निकलेगा क्रांति का एक लड़ा होगा।
सोए जनप्रतिनिधि को जगाएगी ये जनता की ढाल,
अब नहीं चलेगी बहानों की कोई चाल।

अंतिम प्रहार
चम्बल का पानी बोले, अब सहना है बेकार,
पिंपल की छाँव कहे, कर दो अत्याचार पर वार।
विद्रोही की कलम बोले, अब रण का हुआ ऐलान,
खड़ावदा माँगे जवाब, दे दो सबका समाधान!

अपने गाँव वासियों को कवि गोपाल जाटव विद्रोही का राम-राम,
अब सोना नहीं है साथियो, करना है जनता का काम।
जागो! लड़ो! हक पाओ! यही है विद्रोही का पैगाम,
खड़ावदा को बनाना है, मध्यप्रदेश का ललाम।

कवि – गोपाल जाटव ‘विद्रोही’
खड़ावदा, तह. गरोठ, जिला मन्दसौर, मध्यप्रदेश

जय खड़ावदा! जय संघर्ष!

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