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नसीब अपना-अपना

जिंदगी वही
चलता रहे शरीर … अच्छी कहो तकदीर
ये तकदीर बनती है बनाए से
जो कर्म किये थे कभी ( पूर्वजन्म )
या निस्वार्थ भाव से किये थे कर्म इस जन्म में–
फल मिला अभी ।
तब मिली होंगी लोगों की दुआएं
यूं ही नहीं मिले सुकून
इस के पीछे छिपा होता है… आत्मीय संतोष का जनून।

फलसफा-ए-जिंदगी ये भी… जिये हैं इमानदारी से
न जाने कौन से कर्मफल
जी रहे ये जिंदगी… लाचारी से
नसीब में क्या ये था बदा….जिंदगी में ये दिन हुए अदा ।

कर्म के साथ नसीब चाहिए… नसीब छिपा दुआओं में
कभी दुआएं मिली है़ं… नेक कर्म किये होंगे तो मिली है
औलाद अच्छी …ये भी नसीबों में लिखा फल।

आज कहलाया तूं वरिष्ठ जन
सुकून की सांस संग .. चले दुआओं का रंग
जिंदगी जी थी जो कठिन
किसी-किसी को मिले ये नसीब
पाएं दीर्घायु …सुकून भरे पल
तभी ये जिंदगी सफल।
– महेश शर्मा,करनाल

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