
एक दिन सब छूट जाएगा,
माँ की उँगली, माँ के आँचल की छाँव,
वो आँगन जहाँ चलना सीखा था,
जहाँ पहली बार गिरे थे, फिर सँभाले गए थे,
एक दिन सब छूट जाएगा।
गलियों का शोर, दोस्तों का ज़ोर,
गाँव के कुएँ का शीतल जल,
पोखर में लगाई वो बेफिक्र छलाँग,
आम के बाग़ों का मोहक संसार,
एक दिन सब छूट जाएगा।
खो-खो, लंगड़ी, कबड्डी, छुपन-छुपाई,
माँ की डाँट, पापा की फटकार,
और नानी की परियों वाली कहानी,
एक दिन सब छूट जाएगा।
पड़ोसियों के ताने, ताऊ की मुस्कान,
भौजी की छेड़छाड़,
भैया की साली से पहला-पहला प्यार,
और बाबूजी की गोद में बीता बचपन,
एक दिन सब छूट जाएगा।
फिर यादों की गठरी कंधों पर होगी,
आँखों में कुछ नमी, होठों पर मुस्कान होगी,
पीछे छूटे हर चेहरे की एक कहानी होगी,
वक्त के साथ ज़िंदगी आगे बढ़ जाएगी,
पर सच है—
एक दिन सब छूट जाएगा।
आर. एस. लॉस्टम










