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लो, फिर एक और अग्निकांड…

कुछ खबरें केवल समाचार नहीं होतीं, वे भीतर तक झकझोर देने वाला दर्द बन जाती हैं। एक आग की राख अभी ठंडी भी नहीं पड़ती कि कहीं और अग्निकांड की खबर आ जाती है। हर बार सिर्फ इमारतें नहीं जलतीं, किसी के सपने, किसी के अपने, किसी का सहारा और किसी का पूरा संसार राख हो जाता है।

दो-चार दिन शोक, संवेदनाएं और चर्चाएं होती हैं, फिर हम सब अपनी-अपनी दौड़ में लौट जाते हैं। प्रशासन भी कुछ समय के लिए सक्रिय होता है, जांच होती है, निर्देश जारी होते हैं, और फिर वही कहानी किसी नए शहर, किसी नई इमारत और किसी नए परिवार के साथ दोहरा दी जाती है।

सूरत के कोचिंग सेंटर की वह भयावह घटना आज भी स्मृतियों में ताजा है, जब बच्चे जान बचाने के लिए ऊंचाई से छलांग लगाने को मजबूर हो गए थे। आज लखनऊ की घटना ने फिर वही पीड़ा जीवित कर दी। सोचने पर विवश करती है कि आखिर हम कब सीखेंगे? कब सुरक्षा नियम केवल कागजों से निकलकर जमीन पर उतरेंगे?

सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी अपनी जगह है, लेकिन समाज के रूप में हमारी भी उतनी ही जिम्मेदारी है। जिस भवन में हमारे बच्चे पढ़ते हैं, वहां सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम हैं या नहीं, यह पूछना और सुनिश्चित करना भी हमारा कर्तव्य है। किसी भी बच्चे को अपना बच्चा समझकर उसकी सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी।

बार-बार होने वाली ऐसी घटनाएं केवल हादसे नहीं, हमारी सामूहिक लापरवाही का आईना हैं।

ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवंगत आत्माओं को अपने श्रीचरणों में स्थान दें तथा शोकाकुल परिवारों को इस असहनीय दुःख को सहने की शक्ति प्रदान करें।

विनम्र श्रद्धांजलि।
सुनीता की कलम से

Sunita Nalwaya

शिक्षिका,लेखिका

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