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बाल कहानी – चंचल गौरैयाइंजी. रघुराज सिंह कर्मयोगी

        चंचल, काफी चुलबुली गौरैया थी। इधर उधर फुदककती फिरती थी। रामू ,श्यामू दो सगे भाई थे। वह दोनों भाइयों के पास आ जाती। चीं चीं कर अपनी भाषा में कुछ कहती। वे चंचल को हाथ पर बैठा लेते। चंचल भी उनकी उंगली पर पंजों की पकड़ बनाकर बैठ जाती। दोनों भाइयों ने चंचल के लिए घर के आले में घोंसला बना दिया। घोंसले में घर के सदस्य की तरह चैन से रहती थी। दोनों भाई उसका बहुत ध्यान रखते थे। चंचल के लिए समय से दाना रख देते थे। पिछले दिन का पानी बदल कर प्रतिदिन मिट्टी के बर्तन में पीने के लिए ताजा पानी भर देते थे। उसे प्यास लगती तो ताजा पानी पी कर संतुष्ट हो जाती थी। गर्मी के दिनों में रोजाना पानी में नहा लेती थी। तरो ताजा हो कर चहकने लगती। जब मन करता खुले आसमान में उड़ जाती। सजातीय गौरईयाओं से मिलकर खुश होती। इसके बाद पुनः घोसले पर लौट आती। अब उसके कई मित्र भी बन गए। वे उसके पास आ कर खेला करते थे। दोनों भाइयों के व्यवहार से भी वह खुश थी। 
           इसी बीच भानू चिड़ा वहां आ गया। दोनों के सहयोग से दो प्यारे प्यारे बच्चे भी हो गए। अब घोंसला छोटा पड़ने लगा। रामू दूसरा घोसला खरीदने के लिए सागर आर्ट्स की दुकान पर पहुंचा। जहां कई प्रकार के घोसले टंगे हुए थे। वह अच्छा सा बड़ा कृत्रिम घोंसला खरीद लाया। यह घोंसला सूखे कद्दू के गोलाकार खोल से बना हुआ था। चंचल के परिवार के लिए इस घोसले में पर्याप्त जगह थी। जिसे उन्होंने घर में लोहे के कुंडे से बांध कर लटका दिया। घोंसला आरामदायक था। सो चंचल और उसके बच्चों को अच्छा लगा। एक दिन चंचल काफी खुश थी। आकाश में घूमने के इरादे से भूजल एवं मृदा संरक्षण और अनुसंधान फार्म हाउस के हरे भरे जंगल में चली गई। वहां आम,जामुन, आंवला, बरगद, नीम के बहुत सारे छायादार पेड़ फलों से लदे हुए थे। इस फार्म हाउस में वहां के वैज्ञानिक अनुसंधान करते थे। वह जामुन के पेड़ पर बैठ गई। उसने खट्टे मीठे जामुन भरपेट खाए। इधर उसे एक बाज देख रहा था। 
            बाज के इरादे नेक नहीं थे। उसने चंचल का शिकार करने के लिए चंचल पर हमला कर दिया। किसी तरह बाज के चंगुल से छूट कर चंचल नीचे गिर गई। उस समय चंचल ने ऐसा प्रदर्शन किया,जैसे वह मर गई हो। सो बाज उसे छोड़ कर चला गया। चंचल कराहते हुए धीरे धीरे किसी तरह रामू के घर आ गई। वह घायल थी। उड़ नहीं पा रही थी। दरवाजे के बाहर ही गिर पड़ी। प्यास से गला सूख रहा था। शरीर के घावों में दर्द हो रहा था। थोड़ी देर बाद रामू बाहर निकला। उसने देखा चंचल है। घायल भी है। उसके अंदर दया भाव उमड़ पड़ा। चंचल के पास बच्चे और भानू चिड़ा ची ची कर रो रहे थे। रामू ने तुरंत बड़े भैया श्यामू को बुलाया -
       "भैया देखो क्या हो गया चंचल को"? श्यामू ने चंचल को देखा तो विचलित हो गया। प्यार से उसके सिर और पंखों पर हाथ फिराया।
          "रामू तुरंत पानी ले कर आ"। रामू शीघ्र मटके का ठंडा पानी ले आया। चोंच में बूंद-बूंद पानी डालने लगे। चंचल को प्यार से पानी पिलाया। चंचल को ऊर्जा मिली तो उसने आंखें खोल दीं। भानू और उसके बच्चों के चेहरे पर मुस्कान तैर गई। रामू, श्यामू का गांव मैं रहते थे। वहां इलाज के लिए जानवरों का डॉक्टर भी उपलब्ध। नहीं था। रामू बोला - 
         "भैया, हम एक काम कर सकते हैं"।
         "वह क्या रामू"।
         "भैया,जब हम छोटे थे।  किसी को खरोंच लग जाती थी तो पिताजी खेत से अरहर के पत्ते ले आते थे। पत्तों को मसल कर अर्क निकालते थे। फिर चोटिल जगह पर लगा देते थे। कुछ दिनों में चोट ठीक हो जाती थी। कभी कभी नीम की छाल सिल पर घिस कर उसका गाढ़ा घोल खरोंच पर लगा देते थे। घाव ठीक हो जाता था। इन दोनों में औषधीय गुण होते हैं। एंटीबायोटिक गुण के कारण चंचल जल्दी ठीक हो जाएगी"।
         "यह ठीक रहेगा रामू"।
         "तू जा और नीम की छाल ले कर आ। छाल घिस कर लगा देंगे"। बिना कोई पल गंवाए वह तुरंत चाकू से नीम के पेड़ की छाल निकाल कर ले आया। छाल को पत्थर की सिल पर थोड़ा सा पानी डाल कर घिस लिया। इसके बाद चंचल के घाव पर छाल का मिश्रण लगा दिया। इससे उसके शरीर में चींटे से काटने लगे। उसे थोड़ा सा असहज लगा। चंचल के आंसू पलकों को उघाड़ कर आगे की यात्रा पर चल पड़े। उसने दर्द सहन कर लिया। कई दिनों तक छाल लगाई गई। कुछ ही दिनों में चंचल ठीक हो गई। अब वह उड़ सकती थी। रामू ने चहकते हुए उसे अपने हाथ पर उठा लिया। चंचल प्रसन्नता से भर गई। उसने कृतज्ञ नजरों से रामू और श्यामू का धन्यवाद किया। इसके बाद चींचीं करती हुई बच्चों और भानू के साथ घोंसले में चली गई। परिवार में प्रसन्नता का वातावरण निर्मित हो गया।

रचना अप्रकाशित एवं मौलिक है।

पता- 1059/B, 3rd एवेन्यू ,
आदर्श कॉलोनी, डडवाड़ा।
कोटा जं. 324002

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