
आलेखः “पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥” 600 साल पहले जुलाहे कबीर ने जब यह कहा था, तो हमारे समाज की नींव हिल गई थी। न वेद पढ़े, न कुरान रटी, फिर भी उनकी वाणी ‘अमृत’ कहलाई। अमृत इसलिए नहीं कि मीठी थी, बल्कि इसलिए कि कटु सत्य बोलकर समाज में फैले रोग मिटाती थी। कबीर की वाणी में प्रेम का अमृत है, पर पाखंड पर प्रहार का जहर भी है। आज नफरत, दिखावे और भ्रष्टाचार के दौर में कबीर और ज्यादा जरूरी हो गए हैं। कबीरदास ने कटु सत्य के दम पर पाखंड पर बिना लाग लपेट के वार किया। कबीर किसी के भी सगे नहीं थे। मुल्ला को लताड़ा—”कांकड़ पाथर जोरि के, मस्जिद लई बनाय। ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय॥” फिर पंडित को भी नहीं छोड़ा—”पाहन पूजे हरि मिलें, तो मैं पूजूं पहार”। वे कहते थे, ईश्वर न मंदिर में है न मस्जिद में, वह तो “घट-घट में राम” है। कबीर का सबसे कटु सत्य जाति पर था। “जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान”। “एक बूंद से सृष्टि रची, कौन बाम्हन कौन सूद”—इस एक दोहे ने हजारों साल की ऊंच-नीच की दीवार ढहा दी। वे चिल्लाकर बोले—ब्राह्मण वह नहीं जो जन्म से है, ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म को जाने। हिन्दू-मुस्लिम के झगड़े पर उनका तंज था: “हिंदू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना। आपस में दोउ लरि-लरि मुए, मरम न काहू जाना॥”
संत कबीर की ज्ञानमार्गी अमृतवाणी हमें सहज,सरल राह दिखलाती हैं। कबीर किताबी कीड़े नहीं थे। “मसि कागद छूयो नहीं, कलम गही नहिं हाथ”। उनका ज्ञान अनुभव का ज्ञान था। उन्होंने ‘सहज’ सिखाया—दिखावा छोड़ो, स्वाभाविक जियो। “साधो सहज समाधि भली”। कबीर का भगवान ‘निर्गुण’ था—बिना रंग-रूप, बिना नाम। “ज्यों तिल माहिं तेल है, ज्यों चकमक में आग। तेरा साईं तुझ में, जाग सके तो जाग॥” यानी मंदिर-मस्जिद छोड़ो, अपने अंदर झांको। माला फेरने से बेहतर है काम करते हुए राम को याद रखना। “मन न रंगाए, रंगाए जोगी कपड़ा”—भगवा पहनने से कोई योगी नहीं बनता, मन रंगना पड़ता है। उनकी वाणी में जीवन का सार था: “साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय। मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाय॥” यानी अपरिग्रह। जितना चाहिए उतना लो, जमाखोरी करना पाप है।
वर्तमान में कबीर की प्रासंगिकता बढती जा रही है। आजकल धर्म के नाम पर नफरत का बाजार सजाया जा रहा है। आज व्हाट्सएप पर ’80 बनाम 20′ चलता है। मोहल्ले दंगों से जलते हैं। CAA से ज्ञानवापी तक, हर मुद्दा हिन्दू-मुस्लिम बन जाता है। ऐसे में कबीर चीखते हैं: “अव्वल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत के सब बंदे। एक नूर ते सब जग उपज्या, कौन भले कौन मंदे॥” जब नूर एक है तो फिर लड़ाई किस बात की?
पाखंड का नया रूप बाबाओ के आश्रम और उनके ट्रस्ट के रूप में बखूबी दिखलाई देता है। पहले पंडित दक्षिणा मांगता था, आज बाबा करोड़ों के आश्रम में सोने के सिंहासन पर बैठता है। इंस्टाग्राम पर ‘रील’ बनाकर धर्म बेचा जा रहा है। कंठी-माला, टोपी-तिलक दिखावे का सामान बन गए हैं। कबीर तब भी बोले थे—”मन मैला तन उजला, बगुला कपटी अंग”।
भ्रष्टाचार और कमीशन खोरी से चारों तरफ लोग परेशान दिखाई देते है। आजकल बहुत से नेता और अफसर परस्पर मिलीभगत से ‘कमीशन’ खाते हैं, अमीर और गरीब के बीच की खाई बढ़ती जा रही है। भारत भूख इंडेक्स में 111वें नंबर पर है। कबीर का दोहा—”साईं इतना दीजिए” आज की ‘सस्टेनेबल डेवलपमेंट’ की नीति है। फेक न्यूज और अंधविश्वास के दौर में कबीरदास की कड़वी अमृत वाणी की आवश्यकता महसूस हो रही हैं। ‘वैक्सीन में चिप है’, ‘चमत्कारी बाबा आदि से आज भी लोग बहकते नजर आते हैं। आज इस दौर में हमे संत कबीर का तर्कवाद चाहिए: “कहैं कबीर कैसें निबाहे, केर-बेर को संग”। यानी सच और झूठ साथ नहीं रह सकते। आंख मूंदकर मत मानो, सवाल पूछो। वर्तमान में बढते पर्यावरण संकट में कबीर वाणी सार्थक हो रही है। “वृक्ष कबहुं नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर”—कबीर ने 600 साल पहले ‘LiFE मिशन’ सिखा दिया था। AC 16 पर चलाकर क्लाइमेट चेंज रोकने की बात करना बेमानी है। हमें सहज जीवन ही बचाएगा।
निष्कर्ष: कबीर को हमने समाधि-मंदिर में कैद कर दिया, जबकि वे तो ‘बेड़ियां तोड़ने’ आए थे। उनके दोहे रटते हैं, पर जीवन में उतारते नहीं। आज जरूरत ‘कबीर जयंती’ मनाने की नहीं, ‘कबीर को जीने’ की है। जब तक जाति पूछी जाएगी, धर्म के नाम पर खून बहेगा, गरीब भूखा सोएगा—कबीर जिंदा रहेंगे। क्योंकि सत्य मरता नहीं। कबीर की अमृतवाणी कड़वी दवा है, और बीमार समाज को कड़वी दवा ही चाहिए।
“निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय”—आज ट्रोल से डरने वाला समाज कबीर को सुने। तभी भारत ‘सहज’ होगा, ‘समरस’ होगा। तभी हम कह पाएंगे कि कबीर का सपना पूरा हुआ।
मुन्ना राम मेघवाल।
कोलिया,डीडवाना,राजस्थान।










