
ढूंढ़ रहा हूँ खुद को,
पता नहीं कहाँ हूँ मैं।
जिस दिन खुद से मिल जाऊँगा,
कसम से जीत जाऊँगा॥
आग लगी तो बुझाने गया मैं,
न जाने उसमें कहाँ खो गया मैं।
जिस दिन समन्दर ढूंढ लाऊँगा,
कसम से जीत जाऊँगा॥
तमन्ना थी शहर में अमन लाऊँगा,
फूलों से भरा एक चमन सजाऊँगा।
जिस दिन मैं वो वतन ढूंढ़ लाऊँगा,
कसम से जीत जाऊँगा॥
बेच रहे हैं ईमान कौड़ियों के दाम में,
रो रही इंसानियत अपने सूने मकान में।
जिस दिन मानवता ढूंढ लाऊँगा,
कसम से जीत जाऊँगा॥
लहर बस शिक्षा की है विद्या सुनी पड़ी है,
मदिरा भरे प्याले हैं अमृत तन्हा खड़ी है।
जिस दिन मैं संस्कार ढूंढ लाऊँगा,
कसम से जीत जाऊँगा॥
नफ़रत की आँधी में प्रेम बचा रहा हूँ मैं,
अँधियारी गली में दीपक जला रहा हूँ मैं।
जिस दिन मैं उजाला ढूंढ लाऊँगा,
कसम से जीत जाऊँगा॥
रवि भूषण वर्मा
राँची झारखंड










