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आधे-अधूरे ख़्वाब

छप्पन बरस की राह में, कितने बदले हिसाब,
हँसते-रोते संग चले, मेरे आधे-अधूरे ख़्वाब।
कुछ पूरे होकर खिल उठे, कुछ अब भी हैं साथ,
उम्मीदों का हाथ थाम, चलता रहा जीवन पथ॥

आधे-अधूरे ख़्वाब हैं, मेरी इन आँखों में,
चलता हूँ उन्हें लिए, जीवन की राहों में।
आँधी आई सामने, फिर भी रिश्ता न तोड़ा,
हर मौसम में साथ रहे, मेरे आधे-अधूरे ख़्वाब॥

आधे-अधूरे ख़्वाब में, माँ का स्नेह समाया,
पिता के ऊँचे संस्कारों ने, जीना मुझे सिखाया।
सच की राह कठिन रही, फिर भी नहीं डिगा,
यही मेरी पूँजी हैं, मेरे आधे-अधूरे ख़्वाब॥

आधे-अधूरे ख़्वाब में, बसा शब्दों का संसार,
गीत, ग़ज़ल और कविताएँ, जीवन का श्रृंगार।
यदि मेरे कुछ शब्दों से, खिल जाए कोई गुलाब,
सार्थक होगा जीवन तब, मेरे आधे-अधूरे ख़्वाब॥

छप्पन बरस यही कहें, रुकना नहीं जनाब।
साँसों तक मेरे रहेंगे, मेरे आधे-अधूरे ख़्वाब।
जब तक जीवन साथ है, करता रहूँगा प्रयास।
आधे-अधूरे ख़्वाब ही हैं, जीवन का विश्वास॥

योगेश गहतोड़ी “यश”

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