
(कवि – भानुप्रकाश शर्मा)
वसुधा सारी, हमको प्यारी
राष्ट्र ये, विश्व विधाता…।
कर्म-धर्म से, आओ लिख दें
नवभारत की गाथा…।।
महावीर और बुद्ध की वाणी,
और प्यारी गुरबाणी…।
कंकर में भी, शंकर खोजे,
हर सच्चा हिंदुस्तानी…।।
गली गली में गुंजे देखो,
माँ का यहां जगराता….।1।
खेत- बगीचे, हरियाली है,
मिट्टी मानो सोना….।
गंगा जमुना जैसी नदीयां,
सिंचे कोना कोना…।।
श्रम को ही श्रीराम मानकर,
जन जन यहाँ इठलाता…।2।
राणा का रण कैसे भूलें,
शिवबा सबको प्यारे…।
झांसी की मर्दानी ने भी,
दुष्मन थे संहारे….।।
फतेह जोरावर जैसों से ही,
धन्य यहाँ हर माता…।3।
तुलसी, नरसी, नामदेव के
भजन जमाना गाए…।
रामायण हर घर में गुंजे,
गीता सबको भाये…।।
भक्ती और शक्ति से शोभित,
यहाँ फहरे सदा पताका ..।4।
समता, ममता, मानवता का
भाव बहे रग रग में…।
ज्ञान-शील के, प्रखर पुण्य से
खुशहाली हो जग में… ।।
कर्म हमारे, सब के खातीर,
हम तो हैं निर्माता….।5।











