
विकास के इस जमाने में आज,
हम इतने आगे निकल चुके हैं,
कि इंटर्नेट में इतने रम गए हैं,
कि अपने आप में ही खो गए हैं।
हाथ में पकड़े़ हुए मोबाईल की
अहमियत, पास में ही बैठे हुए
अपने माँ-बाप, बीबी बच्चों व
हर व्यक्ति से ज्यादा हो गई है।
नैतिकता यह कि हम दबाव को देख
नहीं पाते जो सामने वाला झेल रहा है,
ठीक वैसे ही सामने वाला उस दर्द को,
जिसमें हम हैं, भी नहीं देख पा रहा है।
यह जीवन है, भले यह काम, परिवार,
भावनाओं, दोस्तों, के साथ क्यों न हो,
एक-दूसरे को समझने की कोशिश,
अपनी अलग अलग करनी चाहिए।
अलग अलग सोचना, एक-दूसरे के
बारे में सोचना और सोचने के बाद
बेहतर तालमेल भी बिठाना चाहिए,
बेहतर जीवन तलाशना ही चाहिये।
हर एक जीवन में ये लड़ाई लड़ता है,
और सबके अपने अपने सुख दुख हैं,
जब हम अपनों से मिलते हैं, तब एक
दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप से तो बचें।
इसके बजाय एक दूसरे को स्नेह व
साथ होने की खुशी का एहसास दें,
आदित्य जीवन की इस यात्रा को प्यार
व भरोसे से आसानी से पार कर सकें।
डा० कर्नल आदि शंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ











