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चार दिन की जिंदगी

जिंदगी के दिन है चार,,,
दो सोच में गुज़र गये ,दो गफलत में गुज़र गये,,

दो रूठने पर खर्च हुए,
दो मनाने में गुज़र गए,,,

हंसी कि तलाश में रहा खुशियों की बाट निहारता रहा,,,,,

दो से मैंने किनारा कर लिया,दो ने मुझे किनारे कर दिया,,,

जिंदगी भर दो जून कि रोटी कमाने में लगा रहा,,,,
बाकी के दिन मेरे
दो बुंद जिंदगी की तरहां दौड़ में हि चले गये,,,,

जिंदगी के दिन है चार,,,
क्या करूं मैं,,
रह रह कर आतें हैं हजारों विचार,,,,

दो में अफसर बन कर रहा मैं,,,,
दो में अफसर ने डाट दिया,,,,

दो दिन अफसोस में लटक गये, ,,
दो दिन विचारों में भटक गये,,,,,

बचपन को खैला नहीं,,,
और जवानी देख नहीं सके,,
देख कर बुढ़ापे को हैं बेबस और लाचार ,,,,,

दो दिन तो दिन रात कमाने में गये,,,
दो दिन दिल की बिमारी में खर्च में गये देखो अब हम है लाचार,,,,

जिंदगी के दिन है चार,,,,
सोच रहा हूं कुछ अच्छा कर लुंगा तो,,,
हरि भजन में कट जाए बाकी की सांसे ,,,,,हरि से करलें प्यार,,,,

अशोक सुमन

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